संपादक : अर्जुन देव सिंह
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जंतर-मंतर पर बैठा युवा सिर्फ अपना नहीं, देश का भविष्य बचाने की बात कर रहा है
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र कई दिनों से शांतिपूर्वक धरने पर बैठे हैं। उनकी मांग साफ है—परीक्षा व्यवस्था ईमानदार हो, दोषियों पर कार्रवाई हो और युवाओं का भविष्य सुरक्षित किया जाए। कुछ प्रदर्शनकारी भूख हड़ताल पर हैं और उनकी सेहत को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उनकी आवाज़ उन लोगों तक पहुँच रही है, जिनके हाथ में फैसला है?
NEET विवाद ने भरोसे को सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाई
परीक्षा सिर्फ एक पेपर नहीं होती, वह लाखों परिवारों के सपनों का नाम होती है। जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो मेहनत करने वाले छात्र खुद से पूछने लगते हैं—क्या केवल मेहनत ही काफी है? यही भरोसा वापस लाना आज सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
पहले भी ऐसे मौके आए, जब लोगों ने जवाब मांगा
यह पहली बार नहीं है जब देश में बड़े मुद्दों पर सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं। मणिपुर हिंसा के दौरान भी कार्रवाई और संवाद के समय को लेकर बहस हुई। किसान आंदोलन एक वर्ष से अधिक चला और बाद में केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए। जंतर-मंतर पर महिला पहलवानों के आंदोलन ने भी पूरे देश का ध्यान खींचा और लोगों ने पूछा कि शिकायतों का समाधान जल्दी क्यों नहीं हुआ। आज छात्र भी वही सवाल पूछ रहे हैं—क्या हमारी बात भी देर से ही सुनी जाएगी?
सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत है
सरकार किसी भी दल की हो, जनता को सवाल पूछने का अधिकार है। सवाल पूछना देश के खिलाफ नहीं होता, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने का तरीका होता है। जनता चाहती है कि उसकी बात सुनी जाए, उस पर जवाब दिया जाए और समय रहते फैसला लिया जाए।
देश का युवा इंतज़ार नहीं, भरोसा चाहता है
भारत दुनिया का सबसे युवा देश बनने की बात करता है। ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि युवाओं का भरोसा मजबूत रहे। अगर एक छात्र का विश्वास टूटता है, तो केवल उसका नहीं, उसके पूरे परिवार का मन टूटता है। सरकार, संस्थाओं और समाज—तीनों की जिम्मेदारी है कि युवाओं को यह महसूस हो कि उनकी मेहनत का सम्मान होगा और न्याय समय पर मिलेगा।
अंतिम सवाल
आज सवाल किसी एक परीक्षा, एक आंदोलन या एक सरकार का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है। अगर जनता बार-बार सड़क पर उतरकर अपनी बात कहने को मजबूर हो जाए, तो हर जिम्मेदार संस्था को रुककर यह सोचना चाहिए कि आखिर कमी कहाँ रह गई।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि सरकार कितनी ताकतवर है। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह अपने नागरिकों की आवाज़ कितनी ईमानदारी से सुनती है।
अर्जुन शस्त्र
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