Homeसाहित्यकविता“खामोश लफ्ज़, अधूरी दास्तां”

“खामोश लफ्ज़, अधूरी दास्तां”

अनकहे जज़्बातों और अधूरी मोहब्बत की एक भावनात्मक अभिव्यक्ति

मैं उस हाल को कैसे बयां करूं
जो दिल में दफन है मेरे
की बता भी नहीं सकते
और दिखा भी नहीं सकते
इस गुजरते पल को कैसे बयां करूं।।
आंखों में चुभती है वो रातें
जो सपने तेरे दिखती है,
सीने में सिमटी है यादें तेरी
उस मन की लगन को भला
मैं कैसे बयां करूं।।
लफ्ज़ खामोश है मेरे
मगर लाखों सवाल दिल में है मेरे
कहूं कैसे उन अनकहे शब्दों को
कुछ शब्द अधूरे रह गए
भला वो दास्ता अपने मन की
कैसे तुम्हें बयां करूं।।
हमेशा से बना एक शब्द नया
बस हमेशा ही बना रह गया
जो रह गया समय अधूरा
उस समय को मैं कैसे पूरा करूं।।


✍🏻 रचना: अनीता अनंत


अर्जुन शस्त्र
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✍️ संपादक – अर्जुन देव सिंह
📞 Call / WhatsApp: 9758 231 444
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👉 “खामोश लफ्ज़… दिल की वो दास्तां, जो कह न सके”
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